दिल्ली में अवैध निर्माणों में हो रहे हादसों के असल गुनाहगार कौन?

दक्षिणी दिल्ली के पॉश इलाके में स्थित पांच मंजिला इमारत सत्य निकेतन भवन में रविवार 05 सितंबर दोपहर डेढ़ बजे एक बड़ा हादसा घटित हुआ। इस रिहायशी परिसर में छात्रों के पीजी का संचालन हो रहा था। यह इमारत दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के नजदीक है। यह इलाका आरके पुरम विधानसभा क्षेत्र तथा नई दिल्ली लोकसभा क्षेत्र के अधीन आता है।

इस अत्यंत ही हृदयविदारक घटना में अब तक 07 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, कुछ गंभीर रूप से ज़ख्मी हैं। सुनहरे भविष्य के सपने लेकर बेहतर शिक्षण संस्थाओं से शिक्षा ग्रहण की उनकी हसरतें यूँ ही दफ़न हो गई। हमेशा की तरह आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। हर जिम्मेदार व्यक्ति अपने गुनाहों को दूसरे पर थोप रहा है।

हमारा सिस्टम इतना संवेदनहीन है कि उसे इन दुखद घटनाओं से कोई फर्क नहीं पड़ता। जांच दल बनाने की घोषणा, कुछ मुआवजा वितरण, भविष्य के गुलाबी सपने दिखाकर इस नृशंस घटना को भी बिसार दिया जाएगा।

दिल्ली के जंतर मंतर से शुरू हुई जेन-ज़ी की अपने हकों की लड़ाई से एक उम्मीद बंधी थी कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद अब वह बदबूदार सिस्टम की सफाई में अपने को सक्रिय करेंगे पर अभी तक इस दर्दनाक वाकये पर उनकी मुखरता दिखाई नहीं पड़ी है। अभी की उनकी खामोशी अंधी, बहरी और अहंकारी सरकार को अतिरिक्त बल मुहैय्या कराएगी। नीट पेपर लीक मुद्दे पर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को जिम्मेदार बता उन्हें इस्तीफे हेतु मजबूर करने वाली कवायद इस मसले पर भी जरूरी है।

विपदा की इस कठिन घड़ी में कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई और कांग्रेस सेवादल की राहत कार्यों में सक्रियता उम्मीद जगाती है कि ऐसे दर्दनाक हादसों में बिना क्षुद्र राजनीति किए, पीड़ितों की सहायता की जा सकती है। एक तरफ ये लोग बिना शोरशराबे के बचाव कार्य में हाथ बंटा रहे दूसरी तरफ भाजपा की छात्र इकाई एबीवीपी अपनी सरकार का बचाव करते हुए अधिकारियों को कसूरवार ठहराने का शोरगुल कर रही है।

कहां है आरएसएस के स्वयं सेवक जो दंभ भरते हैं कि विपदा के समय वो अपना सबकुछ झोंक देते हैं। केवल बोलबचन से अपने कर्तव्यों की इतिश्री करना इनका पुराना शगल है।

सवाल उठना लाज़मी है की जिनकी इस घटना में प्राथमिक जिम्मेदारी थी पर क्या वे लोग अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं? क्या इन्होंने किसी भी तरह से अपनी जवाबदेही स्वीकारी है? दिल्ली में नगर निगम से लेकर प्रदेश और केंद्र सरकार पर भाजपा का क़ब्ज़ा है।

सबसे दुखद पहलू यह है कि देश का संवेदनहीन प्रधानमंत्री देर रात में जेन-ज़ी को संबोधन के लिए रील तो बना सकता है पर घटनास्थल पर जाकर उस जेन-ज़ी की वेदनाओं पर मलहम नहीं लगा सकता। उन्होंने केवल सोशल मीडिया प्लेटफार्म में इस त्रासदी पर संवेदना प्रकट कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली।

इसी तरह से अपने को चाणक्य तथा लौह पुरुष कहलवाने की सनक लिए गृहमंत्री जो घटना के समय गोआ में अपनी पार्टी के आलिशान कार्यालय केे उद्घाटन में शरीक थे, भागकर दिल्ली तो लौटे पर घटनास्थल पर पहुंचने की जहमत नहीं उठाई। इन्होंने भी सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर संवेदना की चार पंक्तियां लिख और अधिकारियों को निर्देश देकर अपना फर्ज निभा लिया।

असीम दुख की इस बेला में सबसे हास्यास्पद और नाकाबिल ए बर्दाश्त हरकतें मुख्यमंत्री कर रही हैं। उन्हें कैमरे के सामने अधिकारियों को डांटने की नौटंकी करते हुए साफ देखा जा सकता है। डेढ़ वर्षों से सत्ता में काबिज रेखा गुप्ता क्या इतनी भोली हैं कि इन्हें अपने ही मंत्रियों, विधायकों तथा अधिकारियों के अनैतिक क्रियाकलापों की कोई जानकारी नहीं है ? साफ है कि दिल्ली में तमाम कुकृत्यों की जानकारी इन्हें है।

सत्ता के इन भूखे भेड़ियों से न राजनीतिक शुचिता की अपेक्षा है और न ही दुर्घटना की नैतिक जवाबदेही लेने की उम्मीद है ऐसे में सत्ता को भोगविलास मानने वालों से इस्तीफे की उम्मीद करना भी महापाप है।

इस संकट में विपक्ष की भूमिका के तौर पर हम कांग्रेस के प्रयासों की सराहना कर सकते हैं जिसने धैर्यता से अपने कर्तव्यों को निभाया है, पर इस अहंकारी तथा संवेदनहीन सरकार को घुटने के बल लाने का माद्दा देश के जेन-ज़ी के पास ही है, जिन्हें नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का खुला और निःशर्त समर्थन है।

देश के युवाओं से आग्रह है कि इस घुटन भरे दौर में जहां उनकी शिक्षा, उनके रोजगार, उनके सुनहरे भविष्य पर सबसे अधिक खतरा मंडरा रहा है, उन्हें कर्तव्यनिष्ठ नागरिक की बजाय नफरती भीड़तंत्र में तब्दील किया जा रहा है। जेन-ज़ी इस सरकार और उसकी विचारधारा को गहराई से समझे तथा समय रहते ऐसे नाकाबिलों से अपने को बचाते हुए देश और समाज को सही दिशा में आगे लेकर जाने की भूमिका निभाए।

भ्रष्ट सिस्टम की  घोर लापरवाही तथा सत्ताधीशों के आंख मूंदे रखने से घटित इस पीड़ादायक दुर्घटना में अपनी जिंदगी गंवाने वालों को हमारी भावपूर्ण श्रद्धांजलि, घायलों के शीघ्र पूर्ण स्वस्थ होने की कामना करते हैं। इस कई इंजनों वाली सरकारों से कम से कम देश यह उम्मीद तो रखता है कि वह मृतकों तथा घायलों को उचित मुआवजा देते हुए उनके गुनाहगारों को अविलंब कठोरतम दंड दिलवाएगी, अगर उससे यह भी संभव नहीं है तो देश का युवा अवश्य ही इनका उचित इलाज करेगा।

(परमजीत बॉबी सलूजा की टिप्पणी)

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